मोदी सरकार को Green bond बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है?

06:54 PM Jan 24, 2023 | प्रदीप यादव
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मोदी सरकार पहली बार ग्रीन बॉन्ड के जरिये पैसा जुटाने जा रही है. कल 25 जनवरी को RBI सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड की पहली किस्त जारी करेगा. करेंट फाइनेंशियल ईयर यानी 31 मार्च 2023 तक सरकार ने ग्रीन बॉन्ड से 16,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. कल पहली किस्त के तहत 8,000 करोड़ रुपये ग्रीन बॉन्ड जारी होंगे और ग्रीन बॉन्ड की दूसरी किस्त 9 फरवरी को जारी होगी. अब जानते हैं कि ग्रीन बांड क्या होते हैं लेकिन इससे पहले ये जानना जरूरी है कि बॉन्ड क्या होता है. आसान शब्दों में कहें तो बॉन्ड सरकार के लिए पैसा जुटाने का एक जरिया है. सरकार आय और खर्च के अंतर को पूरा करने के लिए पैसा उधार लेती है. यह कर्ज उसे मिलता है बॉन्ड के जरिए. सरकार जो बॉन्ड जारी करती है, उसे गवर्नमेंट सिक्योरिटीज या जीसेक कहते हैं. सरकार की तरह कंपनियां भी अपने कारोबार के विस्तार के लिए बॉन्ड से पैसा जुटाती है. इसे कॉर्पोरेट बॉन्ड कहा जाता है. सरकारी बॉन्ड में निवेश के लिहाज से बहुत सुरक्षित माना जाता है. क्योंकि सॉवरेन गारंटी मतलब इसमें सरकार की गारंटी होती है.

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अब समझते हैं कि ग्रीन बॉन्ड या हरित बॉन्ड क्या होते हैं और सरकार को ये बॉन्ड लाने की जरूरत क्यों पड़ी. दरअसल पिछले कुछ सालों से दुनियाभर में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन काफी बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. हीट वेव, तूफ़ान, अनियमित मानसून, बाढ़ और सूखा…भारत में मौसम की वजह से होने वाली ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से बहुत-सी घटनाएं जलवायु में परिवर्तन की वजह से हो रही हैं. इसके चलते खेती, खाने- पीने के चीजों और पानी वगैरह पर खतरा बढ़ा है. 2015 में भारत सहित दुनिया के 200 से अधिक देशों ने जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और दुनिया के तापमान को 1.5 डिग्री से अधिक ना बढ़ने देने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर की थी. इस प्रतिबद्धता के तहत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जाना था. पिछले साल जलवायु परिवर्तन या क्लाइमेट चेंज को लेकर कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज' यानी सीओपी-27 की बैठक मिस्त्र में 6 से 18 नवंबर को हुई थी. भारत भी इसका सदस्य है. इसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है.

इसीलिए जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों से निपटने के लिए दुनियाभर की सरकारें और बड़ी बड़ी कंपनियां ग्रीन बॉन्ड जारी करके पैसा जुटा रही हैं. इस पैसे का इस्तेमाल ग्रीन प्रोजेक्ट्स जैसे सौर ऊर्जा,  पनबिजली और पानी से बिजली बनाने वाले प्रोजेक्ट्स के विकास में खर्च किया जाता है . फिलहाल ज्यादातर बिजली कोयले या गैस से बनाई जाती है. इससे काफी प्रदूषण होता है.  ज्यादातर देश अब कार्बन उत्सर्जन को कम करने पर तेजी से काम कर रहे हैं ताकि हम लोग सुकून चैन से जी सकें. अब इन ग्रीन प्रोजेक्ट्स के लिए चाहिए मोटा पैसा इसलिए दुनियाभर की सरकारें और बड़ी बड़ी कंपनियां ग्रीन बॉन्ड जारी करती हैं.

अब समझते हैं कि भारत सरकार ने ग्रीन बॉन्ड लाने की योजना कब बनाई थी. सरकार ने 2030 तक देश में कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखा है. सरकार का लक्ष्य है कि देश में जो भी बिजली फिलहाल कोयले वगैरह से पैदा की जा रही है. उसकी जगह 50 फीसदी बिजली ऐसे साधनों से बनाई जाये ताकि कम से कम कार्बन उत्सर्जन हो. बिजली मंत्रालय के अनुसार, देश में बिजली उत्पादन क्षमता 2030 तक 8 लाख 20 हजार मेगावॉट पहुंच जाने का अनुमान है. इसमें 5 लाख मेगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है. बिजली के अलावा कई दूसरी वजहों से भी कार्बन उत्सर्जन होता है. इसे घटाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए पिछले साल बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ग्रीन बॉन्ड लाने का ऐलान किया था.

इन ग्रीन बॉन्ड से रिटेल निवेशकों को क्या फायदा होने वाला है इसे भी जान लेते हैं. 25 जनवरी को 8000 करोड़ रुपए के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जारी होंगे. इसमें 4000 करोड़ वाले ग्रीन बॉन्ड 5 साल के लिए और दूसरे 4000 करोड़ रुपए वाले सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड 10 साल के लिए जारी किए जाएंगे. पांच साल वाले ग्रीन बॉन्ड पर 7.38 फीसदी यील्ड तय की गई है जबकि दस साल वाले बॉन्ड की यील्ड 7.35 फीसदी तक है.  एक्सपर्ट का कहना है कि निवेशकों को इन बॉन्ड के जरिए कम समय में बेहतर और सेफ रिटर्न मिलते हैं क्योंकि इसमें मिलने वाला रिटर्न पहले ही तय हो जाता है. RBI ने एक प्रेस रिलीज में जानकारी दी है कि इन बॉन्ड्स को यूनिफॉर्म प्राइस नीलामी के माध्यम से जारी किया जाएगा. बॉन्ड की कुल राशि में से 5 फीसदी के बराबर की राशि के बॉन्ड रिटेल इंवेस्टर्स के लिए रिजर्व रखे जाएंगे.

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