अब ग्राहकों से Service Charge नहीं वसूल पाएंगे रेस्तरां मालिक

06:48 PM Jun 03, 2022 | प्रदीप यादव
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रेस्टोरेंट की तरफ से सर्विस चार्ज के नाम पर की जा रही से वसूली पर लगाम लगाने के लिए सरकार आगे आई है. सरकार ने कहा है कि रेस्तरां की तरफ से लिया जा रहा है सर्विस चार्ज आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रहा है. सरकार ने एकदम साफ शब्दों में कहा कि इस बारे में जल्द ही कानून लाया जाएगा. अब समझते हैं कि असली झगड़ा है क्या. सर्विस चार्ज को लेकर अक्सर ग्राहकों की तरफ से यह बात बार बार उठाई जा रही थी कि कुछ रेस्तरां खाने-पीने के बिल के साथ ने इसे सर्विस चार्ज लगा रहे हैं. कुछ रेस्त्रां तो ग्राहकों की बात मानते हुए सर्विस चार्ज हटा लेते हैं लेकिन कुछ विरोध जताने के बाद भी मनमानी करते हुए सर्विस चार्ज वसूलने से बाज नहीं आ रहे हैं. इसको लेकर देशभर के कई ग्राहकों ने मोदी सरकार से काफी शिकायतें की है. ग्राहकों ने उपभोक्ता मंत्रालय की हेल्पलाइन में इस तरह के शुल्क का भुगतान करते हुए विरोध भी दर्ज कराया था. ग्राहकों का कहना था कि खाने-पीने के बिल के साथ सर्विस चार्ज देने से मना करने पर उन्हें रेस्टोरेंट मालिकों की तरफ से बेइज्जत भी किया गया.

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सर्विस चार्ज के नाम पर ग्राहकों से मोटी वसूली 

अब हम आपको ये भी बतातें हैं कि सर्विस चार्ज के नाम पर ग्राहकों से रेस्तरां मालिक कितना सर्विस चार्ज वसूल रहे हैं. इसे इस तरह से समझते हैं. मतलब जब आप किसी रेस्टोरेंट में खाने का बिल चुकाते हैं तो बिल में खाने-पीने की सामान की कीमत के साथ सर्विस चार्ज और 5 फीसदी जीएसटी लिया जाता है. हालांकि, अगर आप किसी बड़े होटल वगैरह में खाना खाने जाते हैं और जहां होटल के रूम का किराया 7500 रुपये से ज्यादा है तो खाने के बिल में 18 फीसदी जीएसटी चुकाना पड़ता है.  आपको बता दें कि केन्द्र ने जीएसटी चुकाना अनिवार्य कर रखा है जबकि सर्विस चार्ज को मैंडेटरी नहीं किया गया है. यानी यह आपकी श्रृद्धा पर है कि आप सर्विस चार्ज चुकाना चाहते हैं कि नहीं. लेकिन इसमें पेंच तब पैदा हुआ जब रेस्तरां मालिकों ने अपने ग्राहकों से जबरदस्ती सर्विस चार्ज वसूलना शुरू कर दिया. 

क्या कंज्यूमर राइट्स से मिलेगी मदद


अब समझते हैं कि इसको लेकर कंज्यूमर राइट्स क्या क्या हैं. जानकारों का कहना है कि रेस्टोरेंट की इस मनमानी यानी सर्विस चार्ज की वसूली को रोकने के लिए वैसे तो फिलहाल कोई कानून नहीं बना है जिसका पालन करने के लिए रेस्टोरेंट मालिक बाध्य हो. लेकिन देशभर के कई उपभोक्ता संगठनों ने कहा कि रेस्तरां द्वारा सर्विस चार्ज लगाना मनमाना कदम है और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत एक अनुचित और साथ ही प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथा के तहत गलत है. इसको लेकर उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने अप्रैल 2017 में एक दिशानिर्देश जारी किया था . इस गाइडलाइंस के अनुसार, ग्राहक द्वारा खाने का आर्डर देने पर खाने के मेनू के साथ उस पर लगने वाले टैक्स शामिल है. मंत्रालय के इस आर्डर के मुताबिक खाने के सामान के चार्ज और जीएसटी के आलावा किसी भी चीज के लिए उपभोक्ता की सहमति के बिना किसी तरह का टैक्स लेना लेना कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस में आता है यानी रेस्तरां फालतू के चार्ज नहीं लगा सकते हैं. 

रेस्तरां मालिकों ने दी यह दलील

ये तो हो गई सरकार के एक्शन प्लान और ग्राहकों की परेशानी की. अब रेस्तरां मालिकों का भी पक्ष जान लेते हैं. रेस्तरां मालिकों का कहना है कि जब रेस्तरां के मेनू में सर्विस चार्ज का उल्लेख किया जाता है, तो इसमें सर्विस चार्ज का भुगतान करने के लिए उपभोक्ता की सहमति शामिल होती है. रेस्तरां/होटल की तरफ से उपभोक्ताओं से वसूला जाने वाला सर्विस चार्ज, रेस्तरां में काम करने वाले बेटर यानी कर्मचारियों को दिया जाता है. रेस्तरां मालिकों का तर्क है कि सर्विस चार्ज के नाम पर लिया जा रहा पैसा खाना परोसने के नाम पर नहीं लिया जा रहा है.

सर्विस चार्ज पर 18 फीसदी जीएसटी 

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) और फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FHRAI) ने कहा कि सर्विस चार्ज लगाना गैरकानूनी नहीं है. NRAI के प्रेसीडेंट कबीर सूरी ने कहा, " सर्विस चार्ज लेने का सिस्टम एकदम ट्रांसपैरेंट है. यह होटल या रेस्तरां में काम करने वाले कर्मचारियों के हित में है. उन्होंने कहा कि कई ज्यूडिशियल आर्डर में भी इस चार्ज को मान्यता मिल चुकी है.  उन्होंने कहा कि सरकार भी सर्विस चार्ज से रेवेन्यू कमाती है क्योंकि सर्विस चार्ज पर भी 18 फीसदी जीएसटी लिया जाता है . यह पैसा सरकार के खाते में जमा होता है. इंडियन हास्पिटैलिटी इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में करीब 50 हजार छोटे बड़े होटल हैं और लगभग 70 लाख रेस्तरां हैं. करीब 2 करोड़ 30 लाख रेस्तरां ढाबे टाइप हैं. हॉस्पिटैलिटी एवं टूरिज्म इंडस्ट्री हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की तरह है क्योंकि देश की कुल जीडीपी में इसका करीब 10 फीसदी योगदान है और करीब 5 करोड़ लोगों के रोजगार का जरिया बना हुआ है. 


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