क्या गांधी चाहते, तो भगत सिंह को फांसी से बचा लेते?

02:38 PM Mar 23, 2023 | लल्लनटॉप
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23 मार्च, 1931. लाहौर की सेंट्रल जेल. शाम के वक्त फांसी नहीं चढ़ाते. मगर अंग्रेज इतने डरे हुए थे कि उन्होंने तय दिन से एक रोज पहले शाम को भगत सिंह (Bhagat Singh), राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी. गांधी के आलोचक इन तीनों की फांसी का इल्जाम गांधी के माथे डालते हैं. तो क्या सच में ये फांसी गांधी की नाकामी थी? फेसबुक-वॉट्सऐप पर खूब मेसेज चलते हैं कि अगर गांधी चाहते, तो भगत सिंह को फांसी से बचा सकते थे. क्या गांधी ने जान-बूझकर भगत सिंह का कत्ल होने दिया? हम बताते हैं.

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लोगों को गांधी से बहुत उम्मीद थी

इन तीन नौजवान क्रांतिकारियों को लोग ख़ूब जानने लगे थे. एक तो जेल में कैदियों के अधिकारों को लेकर चलाई गई उनकी लंबी भूख हड़ताल. और फिर कोर्ट ट्रायल के समय उनका मिजाज. ये मामला बहुत चर्चित हो गया था. गांधी उस समय के सबसे बड़े नेता थे, सो लोगों ने उम्मीद लगाई हुई थी कि वो कुछ करेंगे.

5 मार्च, 1931 को गांधी और वायसराय इरविन के बीच एक समझौता हुआ. सविनय अवज्ञा आंदोलन की वजह से जेल गए लोगों को रिहा करने का वादा किया कांग्रेस ने. शर्त बस ये थी कि वो हिंसक गतिविधि के आरोपी न हों (फोटो: AP)

गांधी-इरविन राउंड टेबल

17 फरवरी, 1931. गांधी और वायसराय इरविन के बीच बातचीत शुरू हुई. लोग चाहते थे कि गांधी तीनों की फांसी रुकवाने के लिए इरविन पर जोर डालें. शर्त रखें कि अगर ब्रिटिश सरकार सजा कम नहीं करेगी, तो बातचीत नहीं होगी. मगर गांधी ने ऐसा नहीं किया. 'यंग इंडिया' में लिखते हुए उन्होंने अपना पक्ष रखा -

"कांग्रेस वर्किंग कमिटी भी मुझसे सहमत थी. हम समझौते के लिए इस बात की शर्त नहीं रख सकते थे कि अंग्रेजी हुकूमत भगत, राजगुरु और सुखदेव की सजा कम करे. मैं वायसराय के साथ अलग से इस पर बात कर सकता था.

गांधी ने वायसराय से क्या कहा?

गांधी का मानना था कि वायसराय के साथ बातचीत हिंदुस्तानियों के अधिकारों के लिए है. उसे शर्त रखकर जोखिम में नहीं डाला जा सकता है. लेकिन गांधी ने वायसराय के सामने फांसी रोकने/टालने का मुद्दा कई बार उठाया. 18 फरवरी की इस बातचीत के बारे में बताते हुए उन्होंने लिखा है -

इस मुद्दे का हमारी बातचीत से संबंध नहीं है. मेरे द्वारा इसका जिक्र किया जाना शायद अनुचित भी लगे. लेकिन अगर आप मौजूदा माहौल को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आपको भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी की सजा खत्म कर देनी चाहिए. वायसराय को मेरी बात पसंद आई. उन्होंने कहा - मुझे खुशी है कि आपने इस तरीके से मेरे सामने इस बात को उठाया है. सजा कम करना मुश्किल होगा, लेकिन उसे फिलहाल रोकने पर विचार किया जा सकता है.

भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी थे. वो हिंसा के रास्ते ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रहे थे. गांधी इस विचारधारा से सहमत नहीं थे.

गांधी सजा खत्म करवाने की जगह सजा टालने पर जोर क्यों दे रहे थे? 

इरविन ने सेक्रटरी ऑफ स्टेट को भेजी अपनी रिपोर्ट में भी गांधी के साथ हुई इस बात का जिक्र किया. उनके मुताबिक, चूंकि गांधी अहिंसा में यकीन करते हैं इसीलिए वो किसी की भी जान लिए जाने के खिलाफ हैं. मगर उन्हें लगता है कि मौजूदा हालात में बेहतर माहौल बनाने के लिए ये सजा फिलहाल मुलतवी कर देनी चाहिए.

लोग आलोचना करते हुए कहते हैं कि गांधी ज्यादा से ज्यादा सजा को कुछ वक्त के लिए रोकने की अपील कर रहे थे. जबकि उन्हें सजा खत्म करवाए जाने या फिर उसे कम करवाने की कोशिश करनी चाहिए थी. मगर सवाल ये है कि क्या ये मुमिकन था? हम गुलाम देश में जी रहे थे. भगत पर सैंडर्स की हत्या का इल्जाम था. क्या अंग्रेज इन्हें माफ करके भारतीयों को ये संदेश देते कि उनके अधिकारी का कत्ल करने के बाद भी वो बच सकते हैं? एक और चीज थी, जो भगत, राजगुरु और सुखदेव के खिलाफ जा रही थी. वो माफी मांगने के खिलाफ थे. वो अपने लिए किसी तरह की रियायत नहीं चाहते थे. अंग्रेज चाहते थे कि इन तीनों को मिली सजा बाकी युवाओं को डराए. उन्हें संदेश दे कि अगर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाया, तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा.

कानूनी रास्ते तलाशने की भी कोशिश हुई 

29 अप्रैल, 1931 को सी विजयराघवाचारी को भेजी चिट्ठी में गांधी ने लिखा -

इस सजा की कानूनी वैधता को लेकर ज्यूरिस्ट सर तेज बहादुर ने वायसराय से बात की. लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं निकला.

इसका मतलब है कि गांधी और उनके साथियों ने भगत और उनके साथियों को बचाने के लिए कानूनी रास्ते तलाशे थे. मगर कामयाबी नहीं मिली. वो जानते थे कि ये सजा रद्द करवा पाना मुमकिन नहीं होगा. इसीलिए माहौल बेहतर करने के नाम पर वो सजा टालने की अपील कर रहे थे. ताकि फिलहाल सजा रोकी जा सके. फिर सही वक्त आने पर या तो उन्हें रिहा करवाया जा सके या उन तीनों की सजा कम करवाई जाए. गांधी ये भी चाहते थे कि जो वक्त मिले बीच में, उसमें क्रांतिकारियों को हिंसा की राह छोड़ने के लिए राजी कर लें. गांधी को लग रहा था कि अगर ऐसा हो जाएगा, तो शायद अंग्रेजी हुकूमत भगत, राजगुरु और सुखदेव की सजा माफ कर दे. गांधी कोशिश कर रहे थे कि कम से कम कांग्रेस के कराची अधिवेशन तक सजा रोकने की कोशिश करें. शायद इससे आगे कोई राह निकल आए. 20 मार्च को होम सेक्रटरी हबर्ट इमरसन से भी बात की उन्होंने. मगर वहां भी बात नहीं बनी.

ये दूसरे गोलमेज सम्मेलन की तस्वीर है. गांधी-इरविन पैक्ट में कांग्रेस ने इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने की रजामंदी दी थी. (फोटो: यूनिवर्सल हिस्ट्री आर्काइव/ Getty)

वायसराय ने गांधी को क्या मजबूरियां गिनाईं? 

गांधी ने इरविन के सामने ये मुद्दा दूसरी उठाया 19 मार्च, 1931 को. मगर वायसराय ने जवाब दिया कि उनके पास ऐसी कोई वजह नहीं है, जिसे बताकर वो इस सजा को रोक सकें. वायसराय ने कुछ और भी कारण गिनाए. जैसे-

- फांसी की तारीख आगे बढ़ाना, वो भी बस राजनैतिक वजहों से, वो भी तब जबकि तारीख का ऐलान हो चुका है, सही नहीं होगा. 

- सजा की तारीख आगे बढ़ाना अमानवीय होगा. इससे भगत, राजगुरु और सुखदेव के दोस्तों और रिश्तेदारों को लगेगा कि ब्रिटिश सरकार इन तीनों की सजा कम करने पर विचार कर रही है.

भगत सिंह से वादा लेने की कोशिश में थे गांधी 

गांधी ने फिर भी कोशिश नहीं छोड़ी. उन्होंने आसिफ अली को भगत, राजगुरु और सुखदेव से मिलने जेल भेजा. वो एक वादा चाहते थे. कि वो लोग हिंसा छोड़ देंगे. गांधी को लगा कि अगर ऐसा वादा मिल जाता है, तो शायद अंग्रेज मान जाएं. इस बारे में आसिफ अली ने खुद प्रेसवालों को बताया था-

मैं दिल्ली से लाहौर आया, ताकि भगत सिंह से मिल सकूं. मैं भगत से एक चिट्ठी लेना चाहता था, जो रेवॉल्यूशनरी पार्टी के उनके साथियों के नाम होती. जिसमें भगत अपने क्रांतिकारी साथियों से कहते कि वो हिंसा का रास्ता छोड़ दें. मैंने भगत से मिलने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया.

ये 'द ट्रिब्यून' अखबार का फ्रंट पेज, जहां इस फांसी की खबर लीड न्यूज है.

आखिरी समय तक कोशिश कर रहे थे गांधी 

गांधी अपनी कोशिशों में जुटे थे. उन्हें लग रहा था कि शायद वो वायसराय को मना लेंगे. इसीलिए वो कराची अधिवेशन के लिए रवाना होने में भी देर कर रहे थे. 21 मार्च, 1931 को रॉबर्ट बर्नेज़ ने न्यूज क्रॉनिकल में लिखा-

गांधी कराची अधिवेशन के लिए रवाना होने में देर कर रहे हैं, ताकि वो भगत सिंह की सजा पर वायसराय से बात कर सकें.

21 मार्च को गांधी ने इरविन से मुलाकात भी की. फिर से उन्होंने इरविन से अपील की. 22 मार्च को भी वो इरविन से मिले. वायसराय ने वादा किया कि वो इस पर विचार करेंगे. गांधी को उम्मीद दिखी. 23 मार्च को उन्होंने वायसराय को एक चिट्ठी भेजी. ये गांधी की आखिरी कोशिश थी. क्योंकि 24 मार्च को फांसी मुकर्रर थी. गांधी ने निजी तौर पर, एक दोस्त के नाते वायसराय को ये चिट्ठी भेजी थी. जनता का मूड, माहौल, शांति, क्रांतिकारियों को हिंसा के रास्ते से लौटा लाने की उम्मीद जैसी तमाम वजहें गिनाकर गांधी ने अपील की. कहा, सजा रोक दीजिए. मगर उसी शाम फांसी दे दी गई.

लोगों ने गांधी के सामने उनके खिलाफ नारेबाजी की 

24 मार्च, 1931 को कांग्रेस के सालाना अधिवेशन में शामिल होने के लिए गांधी कराची पहुंचे. यहां भी गांधी को लोगों, खासतौर पर युवाओं के गुस्से का सामना करना पड़ा. उनके खिलाफ नारेबाजी हुई. युवा 'भगत सिंह जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए कह रहे थे गांधी ने अंग्रेजों से संधि कर ली और भगत को फांसी चढ़वा दिया.

गांधी ने इसी फांसी के सवाल पर बोलते हुए अधिवेशन में कहा था-

किसी खूनी, चोर या डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के खिलाफ है. मैं भगत सिंह को नहीं बचाना चाहता था, ऐसा शक करने की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती.

ये नहीं कि गांधी भगत सिंह और उनके साथियों की तुलना चोरों-डाकुओं से कर रहे थे. उनका और भगत का रास्ता अलग था. हिंसा और अहिंसा का फर्क था. लेकिन उन्हें ये पता था कि भगत और उनके साथी भी मुल्क से, अपने लोगों से मुहब्बत में ही बलिदान कर रहे हैं. गांधी ने कहा था-

मैं वायसराय को जितनी तरह से समझा सकता था, मैंने समझाया. मैंने हर तरीका आजमा कर देखा. 23 मार्च को मैंने वायसराय के नाम एक चिट्ठी भेजी थी. इसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेलकर रख दी. लेकिन मेरी सारी कोशिशें बेकार हुईं.

कराची कांग्रेस अधिवेशन के शुरुआती सत्र के दौरान गांधी, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस और जमनालाल बजाज (फोटो: malaviyamission.org)

अगर भगत सिंह को फांसी न हुई होती, तो?

अगर भगत सिंह को फांसी नहीं हुई होती, तो भी क्या वो हमारे लिए इतनी ही अहमियत रखते? मुझे शक है. इसकी वजह भी है. नैशनल असेंबली में बम फेंकते समय भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त भी थे. बटुकेश्वर को फांसी नहीं हुई. उन्हें कालापानी भेजा गया. देश आजाद हुआ, तो उन्हें भी रिहाई मिली. मगर आजादी के बाद उन्हें सिगरेट कंपनी की रुपल्ली नौकरी में खर्च होना पड़ा. उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का सबूत मांगा गया. क्यों न ये माना जाए कि ये कृतघ्न देश, ये हम कृतघ्न लोग भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के साथ भी ऐसा ही सलूक करते?

(ये स्टोरी हमारी साथी स्वाति ने लिखी है)

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