स्वीडन में जलाई गई कुरान क्या पूरे यूरोप में दंगे करवा सकती है?

09:02 PM Jan 23, 2023 | साजिद खान
Advertisement

29 अगस्त साल 2020 की बात है. स्वीडन के मालमो शहर में दंगे भड़के हुए थे. शहर की दुकानों और घरों को तोड़ा जा रहा था. कार और ट्रक धू-धू कर जल रहे थे. इससे चार दिन पहले ही एक शख्स ने मालमो शहर की मस्जिद के सामने प्रोटेस्ट करने की इजाज़त मांगी. उसने अपने आवेदन में लिखा कि वो 28 अगस्त को मस्जिद के बाहर रैली करेगा, रैली में भाषण देगा, उस भाषण का मुद्दा था- नॉर्डिक देशों में हो रहा इस्लामीकरण. नॉर्डिक देश माने डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और आइसलैंड.

Advertisement

पुलिस ने इजाज़त नहीं दी. 28 अगस्त को रैली करने की मंशा से वो शख्स अपने समर्थकों के साथ निकला पुलिस ने उसे रास्ते में ही रोक लिया. समर्थकों ने इससे नाराज़ होकर कुरान की एक प्रति को ज़मीन में फेंका और आग लगा दी. साथ ही इसका वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. इससे स्वीडन के स्थानीय मुसलमान नाराज़ हो गए. फिर इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू हुए और प्रदर्शन तब्दील हो गए दंगों में. इस पूरे प्रकरण में वही शख्स चर्चा का विषय बना रहा जिसने मुसलामानों के ख़िलाफ़ रैली करने की इजाज़त मांगी थी. नाम था रासमुस पालुदान. रासमुस पालुदान हार्ड लाइन पार्टी के नेता हैं. और वो इस्लाम और इमिग्रेंट्स के कट्टर विरोधी भी. रासमुस और उनकी पार्टी मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हरबुझे बयान देती रही है. ये लोग मुसलमानों को यूरोप से निकाल फेंकने की वकालत करते हैं. सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो डालते हैं.  

स्वीडन मैप (Google map)

लेकिन 2020 में घटे उस वाकये का ज़िक्र हम आज क्यों कर रहे हैं? क्योंकि एक बार फिर वैसा ही कुछ दोहराए जाने की आशंका बना रही है. इस बार भी केंद्र में रासमुस पालुदान का नाम है. उसने स्वीडन में तुर्की दूतावास के सामने कुरान की एक प्रति जला दी है. इस बार इसकी वजह बनी है तुर्की और स्वीडन के बीच चल रहे तल्ख रिश्ते. स्वीडन नेटो गठबंधन में शामिल होना चाहता है लेकिन तुर्की इसके खिलाफ है. और इसी तना-तनी में दोनों देश एक दूसरे के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं.

तो आइए समझते हैं,

स्वीडन में कुरान जलाने वाला रासमुस पालुदान कौन है?

कुरान जलाने के बाद क्या इंटरनेशनल रिएक्शन आया है?

तुर्की, स्वीडन को नेटो का सदस्य क्यों नहीं बनने दे रहा?

स्वीडन, उत्तरी यूरोप का एक देश है. नई उमर के लोग स्वीडन को फ़ेमस यू-ट्यूबर प्यूडीपाइ की वजह से भी जानते हैं. स्वीडन एक ख़ुशहाल देश है. लोगों का रहन-सहन अच्छा है. प्रोफेशनल और पर्सनल ज़िंदगी के बीच बैलेंस मिलेगा. बच्चों के लिए मुफ़्त स्कूली शिक्षा. पर्यावरण को लेकर सजगता. मज़बूत लोकतंत्र. धर्मनिरपेक्षता. अभिव्यक्ति की आज़ादी. स्वतंत्र मीडिया. इन्हीं सब वजहों से हर साल हेप्पिनेस इंडेक्स की फेहरिस्त में स्वीडन टॉप के देशों में नज़र आता है.

स्वीडन से करीब 4 हज़ार किलोमीटर की दूरी पर तुर्की. वही तुर्की जिसकी इन दिनों स्वीडन से तकरार चल रही है. लेकिन इस तकरार की शुरुवात कब हुई? इसकी शुरुआत हुई 12 मई 2022 को. इस दिन फिनलैंड के राष्ट्रपति सौली नीनिस्टो ने फिनलैंड के नेटो में शामिल होने पर रूचि दिखाई. 4 दिन बाद 16 मई को फिनलैंड के पड़ोसी देश स्वीडन ने भी नेटो में शामिल होने की बात कही. दोनों देश नेटो की सदस्यता के लिए अप्लाई करना चाहते थे. लेकिन तुर्की को इससे ऐतराज हुआ. तुर्की के राष्ट्रपति रिचैप तैयप एर्दोआन का बयान आया, उन्होंने कहा,

‘हम उन देशों को नेटो का सदस्य नहीं बनने दे सकते जो हमपर ही प्रतिबंध लगाते हैं.’

एर्दोआन स्वीडन के 2019 वाले फैसले की ओर इशारा कर रहे थे जब, स्वीडन ने तुर्की को हथियार सप्लाई करने से मना कर दिया था, क्योंकि उस समय तुर्की ने सीरिया में एक सैन्य ऑपरेशन किया.

तुर्की आरोप लगाता रहा है कि स्वीडन और फ़िनलैंड दोनों कुर्दिस्तान वर्किंग पार्टी (PKK) का समर्थन करते रहे हैं. PKK तुर्की की सरकार के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष चलाती आई है. इस संगठन पर अमेरिका और यूरोपियन यूनियन भी पाबंदी लगा चुके हैं. तुर्की कई बार कह चुका है कि स्वीडन और फ़िनलैंड को अपने देशों में आतंकवाद का समर्थन बंद कर देना चाहिए. स्वीडन और फ़िनलैंड में कुर्द समुदाय रहता है और स्वीडन में कुछ सांसद कुर्द मूल के भी हैं. स्वीडन खुले तौर पर कुर्दों का समर्थन करता है. इसी बात से तुर्की नहीं चाहता कि वो नेटो का सदस्य बने.

स्वीडन ने भी नेटो में शामिल होने की ज़िद पकड़ ली थी. उसने पड़ोसी देश फ़िनलैंड के साथ 18 मई 2022 को इसके लिए आवेदन भी कर दिया. नेटो संगठन में किसी को भी शामिल करने के लिए सभी 30 सदस्य देशों और उसकी संसद की अनुमति लेना अनिवार्य होता है. इसके लिए 2 हफ्ते का वक्त लगना था. स्पेन के मैड्रिड में नेटो शिखर सम्मेलन शुरू हुआ. यहां दोनों देशों की सदस्यता पर चर्चा शुरू हुई. चर्चा शुरू हुए अभी 4 घंटे ही बीते थे कि तुर्की ने वीटो का इस्तेमाल कर दिया. और कहा कि हम दोनों देशों के नेटो में शामिल होने का विरोध करते हैं. तभी तुर्की के न्याय मंत्री खड़े हुए और बोले हम स्वीडन के नेटो में शामिल होने का विरोध बंद कर सकते हैं बशर्ते फ़िनलैंड और स्वीडन हमेंवो 33 कुर्द लड़ाके सौंप दे जिन्होंने तुर्की में तख्तापलट की साजिश रची थी.

इन 33 लोगों में एक तुर्की का पत्रकार ब्यूएन कीन्स भी शामिल था. कींस पर तुर्की आरोप लगाता रहा है कि उसने साल 2016 में एर्दोआन सरकार के ख़िलाफ़ तख्तापलट में हिस्सा लिया था. एक डील में कई नेगोशिएशंस भी होते हैं. दोनों पक्ष एक दूसरे से थोड़ा कम ज़्यादा की मांग करते हैं. इन्हीं सब में सात महीने बीत गए. 19 दिसंबर को स्वीडन की सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार ब्यूएन कीन्स के प्रत्यर्पण पर रोक लगा दी. कहा कि ब्यूएन कीन्स को तुर्की के हवाले करना संभव नहीं है. इससे तुर्की नाराज़ हो गया. विदेश मंत्री का बयान आया कि हमने स्वीडन से जो मांगे की थी वो उनका आधा भी नहीं कर पा रहा है. ऐसे में उसे नाटो की सदस्यता मिलना मुश्किल होगा.

8 जनवरी को स्वीडन के पीएम का भी बयान आया. उन्होंने कहा कि हम तुर्की की संभी मांगों को पूरा नहीं कर सकते लेकिन हमें उम्मीद है कि तुर्की हमें नाटो में शामिल होने की मंज़ूरी ज़रूर देगा. स्वीडन के पीएम तुर्की की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखते रहे. वहीं उनके देश से 12 जनवरी को एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में एक संगठन टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के पुतले को रस्सी से उल्टा लटका रहा था, और उनकी तुलना इटली के फासीवादी तानाशाह मुसोलिनी से की थी. मुसोलिनी को दूसरे विश्व युद्ध के खात्मे के वक्त इसी तरह उल्टा लटकाया गया था. इस वीडियो से तुर्की तिलमिला उठा. उसने स्वीडन के राजदूत को तलब किया. जवाबदेही की मांग की. इसपर स्वीडन के पास माफ़ी मांगे के अलावा कोई चारा नहीं था. सो उसने माफ़ी मांग ली.  

21 जनवरी 2023 को यहां एंट्री हुई रासमुस पालुदान की. उसने स्वीडन में तुर्की की एंबेसी के सामने विरोध प्रदर्शन की इजाज़त मांगी थी. उसे इजाज़त मिल गई. पर इससे तुर्की नाराज़ हो गया. तुर्की इस बात की निंदा कर ही रहा था कि रासमुस और उसके समर्थकों ने वहां अपना उपद्रव शुरू कर दिया. उसने प्रदर्शन के दौरान कुरान की एक प्रति में आग लगा दी.

रासमुस पालुदान

रासमुस पालुदान का इतिहास ऐसे ही कांडों से भरा पड़ा है. तो आइए अब थोड़ा रासमुस पालुदान के बारे में भी जान लेते हैं. डेनमार्क की एक पॉलिटिकल पार्टी है. स्ट्राम कुर्स. रासमुस इसी पार्टी का हेड है. उनकी पार्टी मुसलमानों के ख़ात्मे की बात कहती है. इसी मुस्लिम विरोधी अजेंडे पर चलते हुए स्ट्राम कुर्स ने जून 2019 के डेनमार्क चुनाव में भी हिस्सा लिया. मगर इन्हें कुछ गिने-चुने ही वोट मिले. बाद में पता चला कि चुनाव में हिस्सा लेने के लिए इन्होंने धोखाधड़ी की थी. इस आधार पर स्ट्रास कुर्स के ऊपर तात्कालिक पाबंदी लगा दी गई. इस पाबंदी से बचने के लिए स्ट्रास कुर्स ने अपना नाम बदलकर 'हार्ड लाइन' कर लिया और अपना मुस्लिम-विरोधी अजेंडा चलाते रहे. लेकिन रासमुस और उनकी पार्टी को मुसलमानों से क्या समस्या है? उनकी पार्टी का कहना है कि मुसलमान हमारे देश में आकर अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं. और हमारे देशों का इस्लामीकरण कर रहे हैं. जो वो नहीं होने देना चाहते.

दरअसल साल 2012 में जब मिडिल ईस्ट के कई देशों में अरब स्प्रिंग के प्रदर्शन होने लगे तो वहाँ हिंसा भी हुई. जान बचाने के लिए यहां के लोग विदेश पलायन करने लगे. शरणार्थियों का एक बड़ा हिस्सा यूरोप भी पहुंचा. इन्हें पनाह देने वालों में जर्मनी और स्वीडन जैसे देश आगे थे.

शरणार्थियों के साथ मानवीयता दिखाने के लिए इन देशों की काफी तारीफ़ हुई. मगर इनके यहां एक छोटा धड़ा इन शरणार्थियों से खुश नहीं था. ये धड़ा मुसलमानों को शंका की नज़र से देखता था. इस शंका को भड़काने का काम किया दक्षिणपंथी पॉलिटिक्स ने. यूरोप के कई हिस्सों में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए सपोर्ट बढ़ने लगा. रासमुस पालुदान और उसकी स्ट्राम कुर्स पार्टी इसी ऐंटी-मुस्लिम राजनीति के उभार की एक मिसाल हैं. दिसंबर 2018 में एक रासमुस का एक बयान आया था, जिसमें उन्होंने कहा था,‘इस्लाम और मुस्लिम हमारे दुश्मन हैं. सबसे अच्छी चीज़ ये होगी कि इस धरती पर एक भी मुस्लिम ना बचें. तभी हम अपना मकसद पूरा कर सकेंगे.’

इन्हीं बयानों के कारण उन्हें दो बार डेनमार्क में दो बार जेल भेजा जा चुका है. पहली बार 14 दिनों के लिए. और, दूसरी बार एक महीने के लिए. फ़्रांस उन्हें अपने यहां से डिपोर्ट कर चुका है. स्वीडन ने उन्हें दो सालों तक देश में घुसने से रोक दिया था. इन सबके बावजूद रासमुस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है.

एक बार फिर रासमुस ने कुरान की प्रति जलाकर स्वीडन के लिए परेशानी खड़ी कर दी है. स्वीडन ने इसके लिए माफ़ी मांगी है. तुर्की, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र के अलावा कई देशों ने कुरान जलाए जाने की निंदा की है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस घटना पर कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया दी है.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या स्वीडन बस दिखावे के लिए माफ़ी मांग रहा है. और क्या क़ुरआन जलाने जैसी भड़काऊ कार्रवाई करने वालों के ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा? इसके साथ ये बात भी कही जा रही है कि इस घटना से स्वीडन को नेटो की सदस्यता मिलने में कठिनाई जाएगी.  


चीन की जनसंख्या 61 सालों में पहली बार घटी, क्या नुकसान होने वाला है?

Advertisement
Next