नई पनडुब्बी INS वागशीर का समुद्री ट्रायल शुरू, फिर भी हम चीन-पाकिस्तान से पीछे क्यों हैं?

12:11 PM May 23, 2023 | शिवेंद्र गौरव
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INS वागशीर. स्कॉर्पीन क्लास की इस छठी पनडुब्बी (Submarine) को ट्रायल के लिए समुद्र में उतार दिया गया है. ट्रायल्स पूरे होते ही ये सबमरीन इंडियन नेवी (Indian Navy) को सौंप दी जाएगी. साल 2005 में फ़्रांस के नेवल ग्रुप के साथ प्रोजेक्ट-75 के तहत स्कॉर्पीन क्लास की 6 पनडुब्बियां बनाने का करार हुआ था. युद्धपोत और पनडुब्बियां बनाने वाली भारतीय कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने करार के तहत फ्रेंच टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके ये पनडुब्बियां बनाईं हैं. ये 6 पनडुब्बियां अपने तय वक़्त से काफी देर से बनकर तैयार हुई हैं. जबकि असली प्लान साल 2030 तक 24 पनडुब्बियां बनाने का था. वो धरा का धरा है. समुद्री सुरक्षा के मामले में हमारी इस सुस्ती पर सवालिया निशान उठा रहे हैं.

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आज बात भारत की पनडुब्बियों की. समुद्री सुरक्षा के मामले में सुस्ती क्यों है? जबकि हिंद महासागर में हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन इस मामले में हमसे कहीं आगे निकल रहा है.

सबसे पहले बात INS वागशीर की.

आखिरी पनडुब्बी का ट्रायल

भारत सरकार की तरफ से प्रेस रिलीज जारी कर बताया गया कि बीती 18 मई 2023 को प्रोजेक्ट-75 के तहत, छठी और आखिरी स्कॉर्पीन क्लास की पनडुब्बी का समुद्री ट्रायल शुरू कर दिया गया है. और साल 2024 की शुरुआत में इसे इंडियन नेवी को सौंप दिया जाएगा. 23 हजार करोड़ रुपए की लागत का ये प्रोजेक्ट फ्रांस की शिपिंग कंपनी नेवल ग्रुप के साथ साल 2005 में शुरू किया गया था.

नेवी को दिए जाने से पहले इस सबमरीन को समुद्र के अन्दर कई तरह के ट्रायल से गुजरना होगा. इसका प्रोपल्शन सिस्टम (सादी भाषा में - इंजन), हथियार और सेंसर वगैरह की गहन जांच होगी. 
इसके पहले MDL के प्रोजेक्ट-75, स्कॉर्पीन प्रोग्राम के तहत, अब तक 5 सबमरीन नेवी को सौंपी जा चुकी हैं. इनके नाम हैं- INS कलवरी, INS खंडेरी, INS करंज, INS वेला और INS वागीर. 
इन सभी डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में लॉन्ग रेंज गाइडेड तारपीडो और लॉन्च ट्यूब से लॉन्च की जा सकने वाली एंटी-शिप मिसाइल होती हैं. इसके अलावा एडवांस्ड सेन्सर्स होते हैं.

लेकिन इस प्रोजेक्ट में जितना तय था उससे ज्यादा समय और पैसा लगा है. और सबसे बड़ी चिंता है इसी प्रोजेक्ट के दूसरे हिस्से यानी प्रोजेक्ट-75 इंडिया को लेकर. प्रोजेक्ट 75I की लागत 42 हजार करोड़ रुपए की है. इसके तहत 'कूटनीतिक साझेदारी' के जरिए 6 और एडवांस्ड डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन बनाई जानी थीं. ऐसी सबमरीन जो क्रूज़ मिसाइल से जमीन पर हमला कर सकने में सक्षम हों और जिनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी (AIP) हो. इस तकनीक के चलते पनडुब्बी और ज्यादा देर तक पानी के अन्दर रह सकती है. ताकि आसानी से दुश्मन की पकड़ में न आए. लेकिन प्रोजेक्ट- 75I अभी भी ठंडा पड़ा है. विदेशी कंपनियों से तकनीक लेने पर बात नहीं बन पा रही.

विदेशी कंपनियों को 6 नई सबमरीन बनाने के लिए अपनी बोलियां लगाने के लिए फिर अगस्त तक का एक्सटेंशन दिया गया है. ऐसे में कहा जा रहा है कि AIP तकनीक वाली एक सबमरीन बनाने के लिए भी अभी एक दशक से ज्यादा का वक़्त लग जाएगा. जबकि चीन और चीन के मदद के बूते पाकिस्तान इस मामले में हमसे आगे निकल गया है.
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक खबर के मुताबिक, भारत के पास स्कॉर्पीन सबमरीन (वही जिनमें से छठी का समुद्री ट्रायल शुरू हुआ है.) के अलावा सिर्फ 6 पुरानी रूस की किलो-क्लास की सबमरीन और 4 जर्मन HDW सबमरीन बची हैं. वहीं चीन  के पास 50 से ज्यादा डीज़ल-इलेक्ट्रिक सबमरीन और 10 न्यूक्लियर सबमरीन हैं. और चीन, पाकिस्तान को भी AIP तकनीक वाली 8 डीज़ल-इलेक्ट्रिक सबमरीन दे रहा है.

प्रोजेक्ट 75I में देर क्यों?

प्रोजेक्ट में देरी क्यों है, शुरुआत से सारा मामला समझेंगे. पहले भारत में पनडुब्बियों का थोड़ा इतिहास जान लें. 
भारतीय नौसेना के अध्यक्ष रहे अरुण प्रकाश इंडियन एक्सप्रेस अखबार के लिए लिखे अपने एक लेख में बताते हैं कि पाकिस्तान को साल 1963 में अमेरिका से पहली पनडुब्बी मिली थी. अमेरिका और इंग्लैंड हमें दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के बची हुई पुरानी पनडुब्बी दे रहे थे. ऐसे में हमें सोवियत संघ की तरफ रुख करना पड़ा. इसके बाद भारत को साल 1967 से साल 1974 के बीच 8 फॉक्सट्रॉट क्लास की सबमरीन मिलीं. फिर 1981 में जर्मनी की HDW कंपनी की 4 हंटर-किलर सबमरीन मिलीं. इनमें से 2 जर्मनी में ही बनीं जबकि दो जर्मनी की टेक्नोलॉजी लेकर MDL में बनाए गईं.

2 और सबमरीन बनाने की बात चल रही थी. लेकिन इस सौदे को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. और MDL को काम बंद करना पड़ा था. फिर साल 1986 से 2000 के बीच रूस से भी 10 किलो-क्लास सबमरीन मिलीं.

इसके बाद जून 1999 में एक कैबिनेट कमेटी ने प्रोजेक्ट 75 के प्लान को मंजूरी दी. इसके तहत तय किया गया कि साल 2030 तक इंडियन नेवी के लिए 24 सबमरीन बनाई जाएंगीं. जिनमें 18 पारंपरिक और 6 न्यूक्लियर पावर वाली सबमरीन होंगी. इस प्रोजेक्ट को दो हिस्सों या कहें तो दो स्टेजेज़ में बांटा गया. पहली स्टेज प्रोजेक्ट-75 और प्रोजेक्ट-75I. साल 2005 में फ्रांस की कंपनी DCNS (जिसे अब नेवल ग्रुप कहा जाता है) और भारत की MDL के बीच डील हुई. काम शुरू हुआ और 12 साल बाद दिसंबर 2017 में पहली स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन बनाकर नेवी में शामिल की गई. और जैसा कि कहा जा रहा है साल 2024 की शुरुआत में ऐसी छठी सबमरीन इंडियन नेवी में शामिल हो जाएगी. तो कुल मिलाकर पूरे 6 सबमरीन बनकर नेवी तक पहुंचने में 19 साल लग गए. और प्रोजेक्ट की मंजूरी से लेकर अब तक का समय देखा जाए तो कुल साल हुए 19.

अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट द वायर के राहुल बेदी अपनी एक रिपोर्ट में कहते हैं कि इस हिसाब से एक सबमरीन बनने में औसतन 4 साल से ज्यादा का वक़्त लगा है. जबकि डील के वक़्त भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि पहली सबमरीन साल 2012 तक नेवी को सर्विस देना शुरू कर देगी. ये भी कहा था कि हर साल एक सबमरीन के हिसाब से साल 2017 तक बाकी की पांच सबमरीन भी नेवी में शामिल हो जाएंगी. और इसी के साथ साल 2017 में प्रोजेक्ट 75 पूरा हो जाएगा. लेकिन कहे मुताबिक प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ. साल 2017 में पहली सबमरीन INS कलवरी को नेवी को सौंपा गया. जबकि INS खंडेरी 2019 में और INS करंज, INS वेला 2021 में कमीशन किये गए.

जब डील साइन हुई थी तब भारतीय नौसेना के चीफ ऑफ़ स्टाफ अरुण प्रकाश ने कहा था कि डील को लेकर बातचीत में जो समय ख़राब हुआ है उसकी भरपाई करनी होगी. और प्राइवेट कंपनियों को इसमें जोड़कर प्रोडक्शन वक़्त पर पूरा किया जाएगा. लेकिन प्रोडक्शन के लेवल पर भी देर ही हुई. कितनी? इसकी तुलना चीन से कर लीजिए. एक रिपोर्ट के मुताबिक, उसने पिछले 15 सालों में 12 न्यूक्लियर पावर वाली अटैक सबमरीन और बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन बनाई हैं.

प्रोडक्शन में क्या दिक्कतें आईं?

प्रोजेक्ट 75 पर काम शुरू होने बाद साल 2007-08 में ही दिक्कतें आने लगीं. चौंकाने वाली बाते ये कि कॉन्ट्रैक्ट में इंजन, जनरेटर जैसे जरूरी हिस्से और कच्चा माल जैसे कि स्टील वगैरह को सौदे में शामिल ही नहीं किया गया था. ऐसे में फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक हुई. और जरूरी सामान के लिए 1900 करोड़ रुपए जारी किए गए. इस सबके चलते प्रोजेक्ट की लागत तो बढ़ी ही. वक़्त भी ज़ाया हुआ.

इसके बाद साल 2011 में बाढ़ आई तो MDL के डॉकयार्ड का बड़ा हिस्सा पानी में डूबा गया. और जब तक पानी नहीं निकला प्रोजेक्ट को रोकना पड़ा. लेकिन असली  दिक्कत आई मई 2016 में. पनडुब्बियों में 98 'ब्लैक शार्क' हैवीवेट टॉरपीडो (HWTs) लगाए जाने थे. शुरुआती प्लान के मुताबिक इन्हें इटली की एक कंपनी से लिया जाना था. लेकिन उस कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. जिनके चलते बाद में जर्मनी के SUT टॉरपीडो लगाने पड़े. ये अस्सी के दशक के हैं. द वायर के मुताबिक, इंडियन नेवी के ऑफिसर्स ने ये माना कि ये HWT के मुकाबले ठीक विकल्प नहीं हैं. इसके बाद साल 2019 से अब तक सरकार दो यूरोपियन कंपनियों से HWT खरीदने की कोशिश कर रही है.

इसके कुछ वक़्त बाद ऑस्ट्रेलिया के अख़बार द हेराल्ड एंड वीकली टाइम्स में छपी एक डिटेल्ड रिपोर्ट भी प्रोजेक्ट के लिए मुसीबत का सबब बनी. अखबार ने 22 हजार 408 पन्नों की इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में इन स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के फंक्शन और लड़ने की ताकत पर कई जानकारियां दीं. पनडुब्बी के लगभग हर पहलू की बात की गई. पनडुब्बी का शोर का स्तर कितना है, किस फ्रीक्वेंसी पर ये इन्फोर्मेशन जुटाती है, कितनी गहराई में गोता लगा सकती है, रेंज कितनी है वगैरा-वगैरा.

इस डॉक्यूमेंट में पनडुब्बी के अंदर के क्रू के लिए कई तरह के निर्देश भी दिए गए थे. अख़बार ने सबमरीन की सुरक्षा पर भी सवाल उठाया था. लेकिन इंडियन नेवी ने इससे इनकार दिया. और होते-करते प्रोजेक्ट-75 अब पूरा होने को है.

लेकिन मुख्य सवाल अभी भी बाकी है. प्रोजेक्ट की अगली स्टेज यानी प्रोजेक्ट-75I की क्या स्थिति है?

प्रोजेक्ट-75 इंडिया 

प्रोजेक्ट-75 इंडिया. इस स्टेज के तहत भी 6 पनडुब्बियां बनाई जानी हैं. लेकिन इनमें कुछ और खासियतें भी होंगी. मसलन, बेहतर हथियार, बेहतर सेंसर और सबसे ख़ास- एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम यानी AIP. साल 2019 में निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता वाली डिफेन्स इक्वीजिशन काउंसिल ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी . ‘स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल’ के तहत. यानी कई जहाज बनाने वाली कंपनियों में से MDL और L&T यानी (लार्सन एंड टुब्रो) को चुना गया. इन दोनों कंपनियों को सरकार की तरफ से स्ट्रेटेजिक पार्टनर बनाया गया. अब इनका काम था ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्यूफैक्चर (OEM) यानी कुछ विदेशी कंपनियों के साथ करार करके सबमरीन बनाना. 5 OEMs को चुना गया.

ये पांच कंपनियां थीं- फ्रांस की नेवल ग्रुप, जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स, रूस की ROE, साउथ कोरिया की डेवू और स्पेन की नवांशिया.

अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, साल 2019-20 में नेवी की तरफ से कहा गया कि हम प्रोजेक्ट को लेकेर थोड़ा लेट हैं. स्ट्रेटेजिक पार्टनर्स की OEMs के साथ साझेदारी को लेकर फाइनल बोली तय होने में थोड़ा वक़्त लग रहा है. लेकिन फिर अप्रैल 2022 में फ़्रांस के नेवल ग्रुप ने कह दिया कि वो इस प्रोजेक्ट से बाहर निकल रहा है. रूस और स्पेन की कंपनियां भी पीछे हट गईं.

इसकी वजह क्या रही? नेवल ग्रुप का कहना था कि सौदे में मांग की गई है कि AIP की तकनीक का इस्तेमाल सही है, ये साबित किया जा चुका हो. जबकि फ़्रांस की नेवी अभी इस प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल नहीं करती है. ऐसे में इसे अभी आजमाने की जरूरत है. 
दूसरी एक और समस्या टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर बताई गई. कहा गया कि विदेशी कंपनियां अपनी तकनीक और विशेषज्ञता शेयर नहीं करना चाहती थीं. जो कि इस स्ट्रेटेजिक पार्टनर मॉडल के तहत सबमरीन बनाने पर उन्हें करना पड़ता.

अब ये AIP तकनीक इतनी जरूरी क्यों है? इसे भी समझ लीजिए.

किसी भी पनडुब्बी के बार-बार पानी की सतह पर आने से दुश्मनों की नजर में आने का खतरा बढ़ जाता है. और AIP तकनीक वाली पनडुब्बी, पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तुलना में ज्यादा देर तक समुद्र के अंदर रह सकती है. अंतर समझें तो एक AIP इक्विप्ड सबमरीन पानी के अन्दर 15 दिन से भी ज्यादा वक़्त तक रह सकती हैं. जबकि पारंपरिक पनडुब्बियों को अपने जनरेटर चलाने के लिए 2 से 3 दिन में पानी की सतह पर आना पड़ता है. इन्हीं जनरेटरों से पनडुब्बी की बैटरी रिचार्ज होती है. जिसके सहारे पनडुब्बी पानी के अन्दर चलती है.

हालांकि भारत का डिफेन्स रिसर्च एंड डेवेलपमेंट आर्गेनाईजेशन (DRDO) भी AIP टेक्नोलॉजी विकसित करना चाहता है. इस दिशा में उसकी कोशिशें जारी हैं. वहीं दुनिया के करीब 10 देशों ने ये तकनीक विकसित कर ली है. और अब तक करीब 20 देशों के पास AIP सबमरीन हैं. लेकिन प्रोजेक्ट 75I को लेकर अभी स्थिति साफ़ नहीं है. इसलिए कहा नहीं जा सकता कि भारतीय नौसेना को  AIP इनेबल्ड पनडुब्बियां कब तक मिल सकेंगी.

इधर प्रोजेक्ट में आ रहे इस अड़ंगे के बाद एक्सपर्ट्स एक पुरानी स्थिति की तरफ भी इशारा करते हैं. साल 1981 में भारत ने जर्मन सरकार के साथ एक डील साइन की थी. इसके तहत भारत ने 2, U-209 पनडुब्बियां जर्मनी से खरीदीं  जबकि 2  को MDL ने जापानी तकनीक की मदद से यहीं बनाया था. ये पनडुब्बियां बनीं लेकिन अगली 2 और पनडुब्बियां बनाने के लिए होने वाली डील रद्द हो गई. वजह जो हमने आपको ऊपर बताई. भ्रष्टाचार के आरोप.  जिसके चलते सिर्फ 2 पनडुब्बियां बनाने के बाद सालों के लिए प्रोडक्शन लाइन खाली हो गई. हमारे इंजीनियरों ने जो सीखा वो बेमलब गया. भारतीय नौसेना के अध्यक्ष रहे अरुण प्रकाश इसे काबिलियत और क्षमता का नुक्सान बताते हैं.

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