तालिबान ने अपने करीबी को अमेरिका की जेल से कैसे छुड़वाया?

08:41 PM Sep 20, 2022 | साजिद खान
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ड्रग किंग, जो एक समय तक अमेरिका का चहेता था. फिर समीकरण बदले और वो अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मनों की लिस्ट में पहुंच गया. उसके ऊपर अमेरिका में मुकदमा चला. आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई. अब ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका को उसको जेल से रिहा करना पड़ा?

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इस कहानी में 3 पात्र हैं. मार्क फ़्रेरिक्स मुल्क़ -अमेरिका. काम - सिविल इंजीनियरिंग.

दूसरा हाजी बशीर नूरज़ई, मुल्क़ - अफ़ग़ानिस्तान. काम - पूर्व ड्रग तस्कर.

मार्क फ़्रेरिक्स और हाजी बशीर का संबंध आगे बताएंगे. पहले तीसरे शख़्स के बारे में जान लीजिए.

इन महाशय का नाम हेनरी किसिंजर है. उनका एक कनेक्शन भारत से भी है. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान किसिंजर अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. उन्हीं की सलाह पर राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान की मदद के लिए यूएस आर्मी का सातवां बेड़ा रवाना किया था.

आज की कहानी में किसिंजर का ज़िक्र क्यों? वजह है, उनका एक चर्चित बयान. किसिंजर ने एक दफे कहा था,

“It may be dangerous to be America's enemy, but to be America's friend is fatal.

यानी, अमेरिका से दुश्मनी मोल लेना ख़तरनाक हो सकता है, लेकिन अमेरिका से दोस्ती गांठना जानलेवा है.”

बहुत संभव है कि हाजी बशीर ने किसिंजर का बयान नहीं सुना होगा. नतीजतन, एक समय तक अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के सबसे चहेते लोगों में से एक बशीर अचानक ही मोस्ट वॉन्टेड की लिस्ट में आ गया. उसे सबसे कुख्यात ड्रग तस्करों की लिस्ट में डाल दिया गया. फिर एक अदालत ने आजीवन क़ैद की सज़ा सुना दी. जिस अपराध में हाजी बशीर को जेल में डाला गया था, उसमें उसकी पूरी उम्र सलाखों के भीतर कटने वाली थी. लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट बाकी था. 19 सितंबर 2022 को हाजी बशीर नूरज़ई काबुल के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में आज़ाद खड़ा दिखा. तालिबानी अधिकारियों के साथ मुस्कुराता हुआ. दूसरी तरफ़, अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन शिकन में डूबे दिखे. उन्होंने कहा, ये फ़ैसला बेहद मुश्किल था.

तो, आज हम जानेंगे,

हाजी बशीर नूरज़ई की पूरी कहानी क्या है?

और, अमेरिका को उसको रिहा करने का मुश्किल फ़ैसला क्यों लेना पड़ा?

हाजी बशीर नूरज़ई 1961 में अफगानिस्तान के कंधार में पैदा हुआ था. जैसे-जैसे वो बड़ा हो रहा था, अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ का प्रभाव बढ़ने लगा था. बशीर आज़ाद अफ़ग़ानिस्तान का हिमायती था. उसके मन में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ गुस्सा भर गया. फिर साल आया 1979. सोवियत संघ ने अपना दबदबा बचाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में सेना उतार दी. तब नाराज़ अफ़ग़ानों ने जंग का ऐलान कर दिया. इसमें बशीर को अपना गुस्सा दिखाने का मौका मिला.

हाजी बशीर नूरज़ई (AP)

इसी समय लड़ाई के समानांतर एक और कहानी चल रही थी. इस कहानी का बशीर पैसों के पीछे पागल था. वो कम समय में ज़्यादा पैसा कमाना चाहता था. इसके लिए उसने अफ़ीम की खेती शुरू की. साथ ही उसने हेरोइन बनाने के लिए कई लैब्स भी बनाए. बशीर का धंधा चल निकला. एक समय उसका कारोबार इतना बड़ा हो गया कि अमेरिकी अधिकारी उसे "एशिया में हेरोइन तस्करी का पाब्लो एस्कोबार" कहने लगे थे.

1989 में सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध खत्म हो गया. कुछ मुजाहिदीन वापस अपने गांव लौट गए. कुछ आपस में लड़ने लगे. इनमें से एक मुल्ला उमर था. वो आगे चलकर कंधार में तालिबान की नींव रखने वाला था. कुछ समय बाद बशीर की मुलाक़ात मुल्ला उमर से हुई. मुलाक़ात दोस्ती में बदली और बशीर तालिबान का हिमायती बन गया.

बशीर के पास अंधा पैसा था. मुल्ला उमर को ज़रूरत थी फ़ंडिंग की. फ़ंडिंग, जिससे हथियार खरीदे जा सके. लेकिन मुल्ला उमर को अफ़ीम की खेती पसंद नहीं थी. उसने बशीर को सिर्फ़ इस शर्त पर अफ़ीम उपजाने की इजाज़त दी थी कि वो तालिबान को पैसे देगा.

फिर साल आया 2001 का. 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया. तालिबान के साथ लड़ाई में अमेरिका का पलड़ा भारी था. तालिबान को काबुल छोड़कर भागना पड़ा. और, तब बशीर ने साइड पलट ली. वो अमेरिका का साथ देने के लिए राज़ी हो गया. उसने अमेरिकियों से कहा कि मैं आपकी मदद ऐसे इलाकों में कर सकता हूं जहां पहुंचना बहुत मुश्किल होता है. ये भी कहा कि, मैं छिपाए गए हथियारों और तालिबानी नेताओं का पता लगाने में भी मदद करुंगा.

कुछ वक्त तो दोनों के बीच मामला ठीक चला, लेकिन फिर रिश्ते में खटास आनी शुरू हो गई. बशीर अमेरिकियों से नाराज़ हो गया. दोनों कई बातों पर एकमत नहीं हो पा रहे थे.

साल 2005 में बशीर न्यू यॉर्क जाता है. वहां उसकी गिरफ्तारी होती है. बशीर पर केस चलता है. फिर 2008 में उसे नशीली दवाओं से संबंधित साज़िश के आरोपों में दोषी ठहराया जाता है. एक साल बाद, उसे आजीवन कारावास की सजा सुना दी जाती है. तब यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट के एक अधिकारी ने कहा था कि उसने अपने नशीले पदार्थों के व्यापार से तालिबान की मदद की. तालिबान के शासन से उस इलाके में दुनिया के कई खतरनाक आतंकी पैदा हुए. आज की सजा निश्चित रूप से बशीर के लंबे आपराधिक करियर का अंत है.

बशीर की कहानी को अल्पविराम देते हैं.

अब कहानी मार्क फ़्रेरिक्स की.

मार्क फ़्रेरिक्स अमेरिकी सिविल इंजिनियर हैं. मार्क उस समय, इंटरनैशनल लॉजिस्टिक सपोर्ट के डायरेक्टर थे. कंपनी के काम से उनका अफ़ग़ानिस्तान आना- जाना लगा रहता था. मार्क अमेरिकी नौसेना में गोताखोर के रूप में भी काम कर चुके हैं.

वो 2020 में अफगानिस्तान में काम करने गए हुए थे. 31 जनवरी 2020 को मार्कअचानक गायब हो गए. मार्कको उनके फोन से ट्रैक करने की कोशिश की जाती है. फोन की लोकेशन एक गांव की बताती है. गांव में छापा पड़ता है लेकिन मार्कनहीं मिलते. फिर खबर मिलती है कि मार्कहक़्क़ानी नेटवर्क के कब्ज़े में हैं. हक़्क़ानी नेटवर्क तालिबान से जुड़ा है. नेटवर्क का मुखिया सिराजुद्दीन हक़्क़ानी मौजूदा तालिबान सरकार में गृहमंत्री है.

मार्क फ़्रेरिक्स (Twitter)

2020 में अमेरिका और तालिबान ने शांति समझौता कर लिया. अमेरिका तालिबान छोड़कर जाने के लिए राज़ी हो गया. लेकिन इस समझौते में कहीं भी मार्कका ज़िक्र नहीं था. इससे मार्कके घरवाले नाराज़ हुए. जब तालिबान से पूछा गया कि मार्ककहां है. तब तालिबान ने कहा कि हम नहीं जानते. वो कहीं भी हो, अफ़ग़ानिस्तान में नहीं है.

फिर 1 अप्रैल, 2022 एक वीडियो जारी हुआ. उसमें एक व्यक्ति आज़ादी की गुहार लगा रहा था. वो मार्कफ़्रेरिक्स थे. इस वीडियो के बाद मार्क की चर्चा फिर से शुरू हुई. अंदरखाने में बातचीत का लंबा दौर चला. तालिबान ने माना कि मार्कउसके क़ब्ज़े में है. फिर 19 सितंबर, 2022 को तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने मार्ककी वापसी की घोषणा कर दी.

आज हम इन दोनों की कहानी क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, जिन दो लोगों की कहानी हमने सुनाई, वो एक-दूसरे के देश में बंद थे. अब उनकी अदला-बदली हो गई है. तालिबान ने मार्कको अमेरिका के हवाले कर दिया. जबकि अमेरिका ने हाजी बशीर को तालिबान को सौंप दिया. इस मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि ये फ़ैसला मुश्किल था. लेकिन क्या ये मुश्किल फ़ैसला ग़लत भी साबित होगा, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.


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