हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में क्या बहस हुई?

01:00 AM Sep 21, 2022 | निखिल
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राहुल गांधी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है. केरल में भारत जोड़ो यात्रा में वो एक छोटी बच्ची के साथ नजर आ रहे हैं. बच्ची ने हिजाब पहन रखा है. तस्वीर के आते ही पक्ष और विपक्ष सोशल मीडिया पर अपने तर्क-कुतर्क के साथ हाज़िर हो गए. कांग्रेस समर्थकों ने इसे प्यारी तस्वीर बताया तो बीजेपी समर्थकों ने इसे तुष्टिकरण करार दे दिया. राजनैतिक चर्चा से इतर हिजाब पर एक लंबी जिरह सर्वोच्च अदालत में भी चल रही है. आपको याद होगा कि कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब को लेकर विवाद शुरु हुआ. मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में गया. जहां से स्कूल प्रशासन के पक्ष में फैसला आया और यूनिफॉर्म वाले शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर रोक लग गई.

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मुस्लिम पक्ष इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले आया है. मामले का नाम है ''आइशत शिफा  बनाम कर्नाटक राज्य' जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने आज लगातार आठवें दिन इसे सुना. और इस दौरान एज़ेंशियल प्रैक्टिस से लेकर ईरान में हिजाब के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों का ज़िक्र हुआ. सबरीमाला मामले की भी चर्चा हुई. कोर्ट को दो बड़े सवालों का जवाब खोजना है,

- पहला ये कि क्या हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है? 
- दूसरा ये कि सरकार और कोर्ट धार्मिक प्रैक्टिस को किस हद तक परिभाषित कर सकती है?

सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस धूलिया ने कहा कि क्या हम आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को अलग कर मामले को नहीं देख सकते? तब याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने जवाब दिया कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने तो केवल जरूरी धार्मिक प्रथाओं के प्रश्न पर ही मामले को निपटा दिया. सुप्रीम कोर्ट को इस सवाल का फैसला करना है कि क्या कोई धार्मिक प्रथा, धर्म का एक अभिन्न अंग है? और इसपर हमेशा सवाल उठते रहेंगे क्योंकि संबंधित समुदाय ही ऐसा फैसला ले सकता है. उसके फैसले में अधिकांश लोगों की राय सम्मलित होती है. अगर ये आवाज नहीं सुनी गई तो विरोध का स्वर उठेगा.

इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि यूनिफॉर्म का लक्ष्य स्कूलों में असमानता के विचार से बचना है. हम स्कूलों में अमीरी या गरीबी नहीं दिखा सकते. इसलिए ड्रेस की जरूरत महसूस हुई. इसपर दवे ने जवाब दिया कि मैं बिल्कुल सहमत हूं. हर संस्था को अपनी पहचान पसंद होती है.

फिर सबरीमला केस का जिक्र हुआ. दवे ने कहा, 

“सबरीमाला फैसले और हिजाब मामले में हाईकोर्ट के फैसले में अंतर है.” 

जस्टिस गुप्ता ने इसपर पूछा, कि वहां सभी को मंदिर में प्रवेश का मौलिक अधिकार नहीं है?

तब दवे ने कहा - 

''नहीं, कोर्ट के फैसले के बाद यह तय हो गया है कि हर कोई मंदिर में प्रवेश कर सकता है."

तभी जस्टिस गुप्ता ने दवे को बीच में रोकते हुए कह दिया - 

''सबरीमला मामला अभी 9 जजों की पीठ के पास लंबित है. हम उस पर नहीं जा रहे हैं.

इतनी बात हर कोई जानता है कि सबरीमला मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. और लंबित मामलों पर टिप्पणियों से बचा जाता है. तब उसका ज़िक्र क्यों हुआ? दरअसल याचिकाकर्ताओं की तरफ से सबरीमला केस को आधार बनाते हुए हिजाब मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग हो चुकी है. दलील ये है कि जब सबरीमला में ये तय नहीं हो पाया कि एज़ेंशियल प्रैक्टिस या अनिवार्य प्रथा क्या है, तो हिजाब मामले में ये कैसे तय कर लिया गया.

खैर सुनवाई वापस आते हैं. आगे दुष्यंत दवे ने कहा- 

“लड़कियां हिजाब पहनना चाहती हैं, तो इससे किसके संवैधानिक अधिकार का हनन हुआ? दूसरे छात्रों के या स्कूल के? या सार्वजनिक व्यवस्था के? यही एकमात्र आधार है, जिस पर हमारे खिलाफ तर्क दिया जा सकता है. हिजाब पहनने से किसी की शांति या सुरक्षा भंग नहीं होती. इस मामले में गरिमा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. जैसे, एक हिंदू महिला अपने सिर को ढंकती है. ये सम्मान से जुड़ा है.”

तब जस्टिस गुप्ता ने कहा,

“गरिमा की परिभाषा बहुत बदल गई है, और बदलती रहती है.”

दवे ने इस पर जवाब दिया कि ऐसा क्यों है कि अचानक 75 साल बाद राज्य ने इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने का विचार किया? इसके लिए राज्य के पास कोई न्यायसंगत कारण या औचित्य नहीं था. यह एक चौंकाने वाला फैसला था. कर्नाटक में कई बार अल्पसंख्यक समुदाय को टारगेट किया गया है. दवे के इस बयान पर सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने ऐतराज जताया. कहा कि ये पब्लिक प्लेटफार्म नहीं है की आप आरोप लगाते रहें. आप कानून के प्रश्न पर दलील रखें.

थोड़ा रुकते हुए दवे ने बात आगे बढ़ाई कि हम एक समुदाय के मन में डर नहीं बना सकते. क्योंकि भारत में 16 करोड़ मुस्लिम रहते हैं. आगे दवे ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म संसद वाले भाषण का भी जिक्र किया. विवेकानंद को कोट करते हुए वो बोले- 

"India has culture of tolerance."

मतलब ये कि भारत में सहिष्णुता की संस्कृति है.

सुप्रीम कोर्ट ने दवे की दलीलों को सुनने के बाद कहा- 

“याचिकाकर्ताओं की तरफ से मौखिक तर्क समाप्त हुए. कोई अन्य तर्क हो तो लिखित में दीजिए.”

इसके बाद सरकार के वकील तुषार मेहता की दलीलें शुरू हुईं. मेहता ने कहा-  

“स्कूलों ने हिजाब के बारे में कुछ नहीं कहा है. वे कहते हैं कि सभी छात्र निर्धारित ड्रेस पहनेंगे. सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों की आवाज दबाने की जो दलीलें दी गई, ये सब गलत हैं. सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने के कारण सरकार को ऐसी परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना पड़ा.”

तब जस्टिस धूलिया ने सवाल किया, कि 

''वैसे क्या थी सार्वजनिक व्यवस्था?''

मेहता ने जवाब दिया कि इस मुद्दे पर आंदोलन होने लगे थे. कानून व्यवस्था बिगड़ने के आसार बनते जा रहे थे. मेहता ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी PFI का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा- 

"2022 में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया नामक संस्था द्वारा सोशल मीडिया पर एक आंदोलन शुरू किया गया. सोशल मीडिया कैंपेन्स को लोगों की धार्मिक भावनाओं के आधार पर डिजाइन किया गया. सोशल मीडिया के संदेशों में कहा गया है कि हिजाब पहनना शुरू करें. एक FIR दर्ज है और अब PFI के खिलाफ चार्जशीट भी तैयार हो रही है." 

मेहता ने दलील दी कि हिजाब विवाद एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था. ये बच्चे PFI की सलाह के मुताबिक काम कर रहे थे. साल 2021 तक किसी भी छात्रा ने हिजाब नहीं पहना था. यह सवाल कभी नहीं उठा था. यह कहना गलत होगा कि सरकार की अधिसूचना केवल हिजाब को प्रतिबंधित करती है, किसी अन्य धार्मिक पोशाक पर नहीं. दूसरे समुदाय के लोग भगवा शॉल या गमछा पहनने लगे थे. लेकिन वो भी प्रतिबंधित है. जबकि बच्चों की तरफ से शुरू से ये दलील जा रही है कि वो पहले भी हिजाब पहनती थे, लेकिन तब कोई विवाद नहीं हुआ.

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने ड्रेस कोड पर बने नियमों का तारीख के साथ हवाला दिया, कहा- जब नियम बनाए गए, तब पैरेंट्स को भी बातचीत में शामिल किया गया था. इसके बाद लंच ब्रेक हो गया. इतनी दलीलें पेश की गईं, लेकिन अभी और लंबी जिरह होनी बाकी थी. लंच के बाद मामले पर सुनवाई शुरू हुई तो कर्नाटक सरकार की तरफ से सरकार के वकील तुषार मेहता ने अपनी दलील आगे बढ़ाई.

मेहता ने कर्नाटक सरकार के आदेश का जिक्र करते हुए कहा, 

"राज्य ने ऑर्डर स्कूलों के लिए पास किया था. छात्रों के लिए नहीं." 

जस्टिस धूलिया ने पूछा कि 

“आप कह रहे हैं कि आपका जोर सिर्फ ड्रेस पर था?”

एसजी मेहता ने जवाब दिया,

"हां, हमने धर्म के किसी भी पहलू को नहीं छुआ."

जस्टिस धूलिया ने फिर पूछा, 

“अगर ड्रेस नहीं होती तो आप आपत्ति नहीं करते?”

मेहता ने इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सामने रखकर पढ़ा, जिसमें कहा गया है कि जहां कोई ड्रेस निर्धारित नहीं है, छात्र ऐसी पोशाक पहनेंगे जो समानता और एकता के विचार को बढावा दे. स्कूलों में किसी विशेष धर्म की कोई पहचान नहीं है. आप केवल एक स्टूडेंट के रूप में वहां जा रहे हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी आदेश को कन्नड़ से अनुवाद कर समझाने को कहा. अदालत में मौजूद कर्नाटक के एडवोकेट जनरल को कहा तो उन्होंने कहा कि कानून सुव्यवस्था शब्द का जिक्र है. इसका मतलब 'लॉ एंड ऑर्डर' है ना कि 'पब्लिक ऑर्डर.'

तुषार मेहता ने दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 

“धार्मिक परंपरा या प्रैक्टिस पचास साल या पच्चीस साल से जारी रहे वो नहीं है. रिलीजियस प्रैक्टिस वो होती है जो धर्म के शुरुआत से ही चल रही हो. वो अभिन्न हिस्सा होती है. अब देखिए तांडव नृत्य तो सनातन धर्म की प्राचीन अवधारणा है लेकिन कोई कहे कि सड़क पर तांडव करते हुए चलना हमारी धार्मिक परंपरा है ये कहना सही नहीं है. अगर कोई मेरे आवश्यक धार्मिक अभ्यास के हिस्से के रूप में कहता है, मैं शराब पीकर सड़क पर नग्न नृत्य करूंगा. क्या इसकी अनुमति होगी? सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के लिए सरकार मुझे गिरफ्तार करेगी.”

इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा- 

let's take a less extreme example.

फिर मेहता ने कहा- 

“चलिए जगन्नाथ रथयात्रा की बात करते हैं. कोविड के दौरान हमने सभी सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया. कहा गया ये धर्म का अनिवार्य हिस्सा है, हमने कहा नहीं- कोरोना काल में ये सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है.”

यहां पर दिलचस्प मोड़ आया. जस्टिस गुप्ता ने तुषार मेहता को तुरंत टोकते हुए कहा- 

“मिस्टर सॉलिसिटर हमने जगन्नाथ रथ यात्रा की अनुमति दी थी, मैं बेंच पर था.”

और ऐसा हुआ था. पहले स्ट्रिक्ट लॉकडाउन के दौरान भी रथयात्रा हुई, कोर्ट ने लोगों की लिमिट के साथ यात्रा को अनुमति दी थी. सुनवाई में जस्टिस धूलिया ने आगे तुषार मेहता से कहा कि वो ये बताएं कि हिजाब पहनना कैसे पब्लिक ऑर्डर को प्रभावित कर रहा था? तब मेहता ने कहा- 

"धार्मिक परंपरा पर अमल इतना आवश्यक होना चाहिए, जैसे सिख कड़ा, केस पगड़ी आदि पहनते हैं. आप दुनिया के किसी भी हिस्से में उनके बिना एक सिख के बारे में नहीं सोच सकते. याचिकाकर्ताओं को ये दिखाना होगा कि प्रथा आवश्यक धार्मिक हिस्सा के लिए सभी परीक्षणों को पूरा करती है."

जस्टिस धूलिया  ने पूछा- कौन तय करता है कि जरूरी प्रथा क्या है?

इस पर मेहता ने कहा- 

"हो सकता है पवित्र कुरान ऐसा कहती है, मुझे स्वीकार है. मैंने नहीं पढ़ी है. कुरान में सिर्फ हिजाब का उल्लेख होने मात्र से वो इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं हो जाती. यह एक धार्मिक प्रथा हो सकती है लेकिन आवश्यक और अभिन्न प्रथा नहीं." 

मेहता ने आगे कहा- 

“ड्रेस एकरूपता और समानता के लिए है. जब आप उस सीमा को पार करना चाहते हैं तो आपका परीक्षण भी उच्च सीमा पर होता है. याचिकाकर्ता ये साबित नहीं कर पाए हैं कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक परम्परा है. कई इस्लामिक देश में महिलाएं हिजाब के खिलाफ लड़ रही है."

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- where are they protesting? मतलब वो कहां प्रदर्शन कर रही हैं? 

तुषार मेहता ने ईरान का जिक्र किया. बोले इस्लामिक मुल्क ईरान में ये सामाजिक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है. हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है, इसलिए हिजाब कोई अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं है. मेहता ने दलील दी कि-  

"जब मैं धर्मनिरपेक्ष शिक्षा में हूं तो धार्मिक पहचान दिखाने वाली पोशाक नहीं हो सकती."

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा - 

“जब सिर पर यूनिफार्म के रंग की कैप की अनुमति हो सकती है तो उसी रंग के हिजाब की क्यों नहीं?”

एसजी मेहता ने कहा, 

“मैं अपने तर्कों को संक्षेप में बताऊंगा. वर्दी निर्धारित करने के लिए एक वैधानिक शक्ति है. ड्रेस पर जोर देते हुए मेहता ने कोविड के दौरान हुई वर्चुअल सुनवाई का भी उदाहरण दिया.”

ड्रेस के महत्व पर जोर देते हुए मेहता ने बोले उस समय जब कुछ वकील बनियान पहनकर सुनवाई में बहस करने आए तो अदालत ने उनको यूनिफॉर्म और संस्थान की गरिमा के मुताबिक तय ड्रेसकोड फॉलो करने को कहा था. कोर्ट ने उनको थोड़ी छूट दी थी लेकिन अनुशासन की बात कही थी. कोर्ट में मंदिरों के एक्ट और पूजा-पाठ के तरीकों पर भी चर्चा हुई.

कुल मिलकर जिरह काफी देर तक चली. सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कल फिर हिजाब मामले की सुनवाई का वक्त दे दिया. सुबह 10:45 बजे मामले की लिस्टिंग की गई है. याचिकाकर्ता और सॉलिसिटर जनरल की दलील के बाद अब कल यानी 21 सितंबर को कर्नाटक सरकार के एडवोकेट जनरल अपने तर्क रखेंगे. हालांकि सुनवाई को देखते हुए ऐसा लगता है कि अभी बहस और बड़ी होने वाली है. काफी हद तक संभव है कि ये मामला भी बड़ी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाए. 


वीडियो: हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बहस नग्न डांस से होते हुए ईरान तक कैसे पहुंची?

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